अज़ान -ए- बिलाल और सूरज का निकलना

आवामुन नास से लेकर खवास तक एक वाक़िया बहुत मशहूर है कि हज़रते सय्यिदुना बिलाल रदिअल्लाहु त'आला अन्हु की ज़ुबान में लुक्नत थी जिसकी वजह से आप रदिअल्लाहु त'आला अन्हु अज़ान के कालिमात को सहीह तौर पर अदा नहीं कर पाते थे, एक मर्तबा आपको अज़ान देने से रोका गया और जब आपने अज़ान नहीं दी तो सूरज ही नहीं निकला!
ये भी कहा जाता है कि हज़रते बिलाल रदिअल्लाहु त'आला अन्हु की "सीन" अल्लाह त'आला के नज़दीक "शीन" है।
इस वाक़िये को कूछ मुक़र्रिरीन बड़े शौक से बयान करते हैं और कुछ लोगों को भी ऐसी मसालेदार रिवायत सुनने में बड़ा मज़ा आता है।

कई मुअ़तबर उलमा ने इस रिवायत का रद्द किया है और इसे मौज़ू व मनघढ़त क़रार दिया है लेकिन फिर भी कुछ मुक़र्रिरीन अपनी आदत से मजबूर हैं, मुक़र्रिरीन की पेशावराना मजबूरी उन्हें ऐसी रिवायत छोड़ने नहीं देती।

ज़रा सा झूठ ज़रूरी है दास्तान के लिये

इस रिवायत के मुतअ़ल्लिक़ उलमा -ए- मुहक़्क़िक़ीन की आरा ज़ेल में नक़्ल की जाती हैं :-

(1) इमाम इब्ने कसीर (मुतवफ्फ़ा 774 हिजरी) इस रिवायत के बारे में लिखते हैं कि इसकी कोई असल नहीं है।

(البداية والنهاية، ج5، ص477)

(2) इमाम शैख अब्दुर रहमान सखवी (मुतवफ्फ़ा 904 हिजरी) इस रिवायत को नक़्ल करने के बाद बुरहान सफाक़ूसी के हवाले से अल्लामा जमालुद्दीन अल मिज़्ज़ी के क़ौल को नक़ल करते हैं कि ये रिवायत अवाम की ज़ुबान पर तो मशहूर हैं लेकिन हमने किसी भी किताब में इसे नहीं पाया।

(المقاصد الحسنة، ص190، ر221)

(3) इमाम सखवी एक और मक़ाम पर लिखते हैं कि इब्ने कसीर ने कहा है की इसकी कोई असल नहीं है और इसी तरह अल्लामा जमालुद्दीन अल मिज़्ज़ी का क़ौल गुज़र चुका।

(ایضاً، ص397، ر582، ملتقطاً) 

(4) अल्लामा अब्दुल वह्हाब शारानी (मुतवफ्फ़ा 973 हिजरी) इस रिवायत के बारे में फरमाते हैं कि ये आवाम की ज़ुबान पर तो मशहूर है लेकिन उसूल में हमने इस बारे में कोई तायीद नहीं देखी।

(البدر المنیر فی غریب احادیث البشیر والنذیر، ص117، ر915 بہ حوالہ جمال بلال)

(5) अल्लामा शारानी मज़ीद लिखते हैं कि इब्ने कसीर कहते हैं कि इसकी कोई असल नहीं।

(ایضاً، ص186، ر1378) 

(6) इमाम मुल्ला अली क़ारी हनफ़ी (मुतवफ्फ़ा 1014 हिजरी) ने भी इस रिवायत को मौज़ू क़रार दिया है।

(الاسرار المرفوعة فی الاخبار الموضوعة المعروف بالموضوعات الکبری، ص140 ،ر76)

(7) अल्लामा बदरुद्दीन ज़रकशी (मुतवफ्फ़ा 794 हिजरी) इस रिवायत को नक़्ल करने के बाद लिखते हैं कि हाफिज़ जमालुद्दीन अल मिज़्ज़ी फरमाते हैं कि ये रिवायत आवाम की ज़ुबान पर तो मशहूर है, लेकिन इस बारे में हमने उम्महातुल कुतुब में कुछ भी नहीं देखा और इस रिवायत के बारे में शैख बुरहानुद्दीन सफाक़ूसी का भी यही क़ौल है।

(اللآلی المنثورۃ فی الاحادیث المشھورۃ، ص207، 208)

(8) अल्लामा इब्नुल मुबरद मुक़द्दसी (मुतवफ्फ़ा 909 हिजरी) इस रिवायत को लिखने के बाद अल्लामा जमालुद्दीन अल मिज़्ज़ी के क़ौल नक़्ल करते हैं कि मुस्तनद कुतुब में इसका कोई वुजूद नहीं है।

(التخریج الصغیر والتحبیر الکبیر، ص109، ر554)

(9) अल्लामा इस्लाईल बिन मुहम्मद अल अजलूनी (मुतवफ्फ़ा 1162 हिजरी) इस रिवायत को लिखने के बाद इमाम जलालुद्दीन सुयूती का क़ौल नक़्ल करते हैं कि उम्महातुल कुतुब में ऐसा कुछ भी वारिद नहीं हुआ और इमाम मुल्ला अली क़ारी फरमाते हैं कि इसकी कोई अस्ल नहीं और अल्लामा जमालुदीन अल मिज़्ज़ी से नक़्ल करते हूये शैख बुरहानुद्दीन सफाक़ूसी फरमाते हैं कि ये आवाम की ज़ुबान पर तो मशहूर है लेकिन अस्ल कुतुब में ऐसा कुछ भी वारिद नहीं हुआ।

(کشف الخفاء و مزیل الالباس، ص260، ر695)

(10) अल्लामा अजलूनी मज़ीद लिखते हैं कि इब्ने कसीर कहते हैं कि इसकी कोई अस्ल नहीं हैं।

(ایضاً، ص530، ر1520) 

(11 से 15) इस रिवायत का रद्द इन कुतुब में भी मौजूद है :-

"تمیز الطیب من الخبیث"، "تذکرۃ الموضوعات للھندی"، "الدرر المنتثرۃ للسیوطی"، "الفوائد للکرمی"، "اسنی المطالب"-

(16) अल्लामा शरीफुल हक़ अमजदी (मुतवफ्फ़ा 1421 हिजरी) लिखते हैं कि ये वाक़िया बाज़ किताबों में दर्ज है लेकिन तमाम मुहद्दिसीन का इस पर इत्तिफाक़ है कि ये रिवायत मौज़ू, मनघढ़त और बिल्कुलिया झूठ है।

(فتاوی شارح بخاری، ج2 ،ص38)

(17) अल्लामा अब्दुल मन्नान आज़मी (मुतवफ्फ़ा 1434 हिजरी) लिखते हैं कि हज़रते बिलाल रदिअल्लाहु त'आला अन्हु को अज़ान से माज़ूल करने का ज़िक्र हमको नहीं मिला बल्कि अयनी, जिल्द पन्जुम, सफहा नम्बर 108 में है कि हज़रते बिलाल रदीअल्लाहु त'आला अन्हु रसूलुल्लाह ﷺ के लिये सफर और हज़र हर दो हाल में अज़ान देते और ये रसूलुल्लाह ﷺ और हज़रते सिद्दीक़ -ए- अकबर रदिअल्लाहु त'आला अन्हु दोनों की आखिरी ज़िन्दगी तक मुअज़्ज़िन रहे।

(فتاوی بحر العلوم، ج1، ص109)

(18) मौलाना गुलाम अहमद रज़ा लिखते हैं कि ये वाक़िया मौज़ू वा मनघढ़त है, हक़ीक़त से इसका कोई ताल्लुक़ नहीं है कि हज़रते बिलाल रदिअल्लाहु त'आला अन्हु से कालिमात -ए- अज़ान सहीह (तौर पर) अदा नहीं हो पाते थे।

(ملتقطاً: فتاوی مرکز تربیت افتا، ج2، ص647)

इन दलाइल के बाद अब इस रिवायत के मौज़ू वा मनगढ़ंत होने में कोई शक बाक़ी नहीं रहता।

अ़ब्दे मुस्तफ़ा

Post a Comment

Leave Your Precious Comment Here

Previous Post Next Post