मुसलमानों को इक़्तिसादी ख़त़रा

जो ह़ालात सौ साल पहले आ़ला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) के वक़्त में थे, वही हालात यकलख़्त पलट रहे हैं।

इस मुजद्दिदे क़ौमो मिल्लत ने, तक़रीबन सौ साल पहले ही, अपनी ख़ुदा-दाद सलाहियतों की बुनियाद पर इस क़ौमे मुस्लिम को, इन काफ़िरों की 'चालों' और उन के 'दज्ल' व 'फरेब' से आगाह किया था। मगर, आह स़द आह, हम ने इस अ़ज़ीम मुफ़क्किर को एक ही शुअ़बे तक मह़दूद कर दिया।

आ़ला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) ने अपनी किताब "अल् मह़ज्जतुल् मुअतमनह फ़ी आयतिल् मुम्तह़नह" में इरशाद फ़रमाया:

"दुश्मन अपने फरीक़ के खिलाफ़ तीन चालें चलता है:

(1) क़त्ल; ताकि दुश्मन का बिल्कुल वुजूद ही ख़त्म हो जाये। अगर ये न हो सके तो...

(2) जलावतनी; ताकि दुश्मन अपने मुल्क व इलाक़े से निकल कर दूर चला जाये। अगर ये भी न हो पाये तो... 

(3) इक़्तिसादी बॉयकॉट (Economic Boycott); ताकि ग़ुरबत व मुफ़्लिसी से दो चार हो कर, हमारा गुलाम बन जाये।"

आप देखें कि आ़ला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) की फ़रासत व फ़िक्र कैसे साबित हुई, और हो रही है। कुफ्फ़ार ने मुसलमानों के खिलाफ़ यही चालें माज़ी में चलीं और आज भी चल रहे हैं। ब-तरतीब देखें:

(1) क़त्ल: मुसलमानों के क़त्ल के लिये उस वक़्त, जिहाद का उमूमी फ़तवा दिया जा रहा था, ताकि बे इमाम व खलीफ़ा क़लील मुसलमानाने हिन्द, काफ़िरों की अक्सरियत के हाथों क़त्ल हो जायें, आ़ला हज़रत (अ़लैहिर्रह़मह) ने इसी ह़िकमत के पेशे नज़र हिन्दुस्तान में जिहाद का फ़तवा न दिया।

और आज 'देशद्रोही', 'गौहत्या', 'कोरोना वायरस' वग़ैरह का इल्ज़ाम आ़इद कर के, मॉब लिन्चिंग के ज़रिये मुसलमानों का क़त्ल हो रहा है।

(2) जलावतनी: पहले 'तहरीके हिजरत (Hijrat Movement)' चलाई गई, जिस के बहाने मुसलमानाने हिन्द को हिन्दुस्तान से निकालने के लिये कोशिशें की गई।

तो आज CAA, NRC, NPR पेश किये जा रहे हैं, ताकि मुसलमानों की जलावतनी हो सके। 

(3) इक़्तिसादी बॉयकॉट: उस वक़्त 'तहरीके खिलाफ़त (Khilafat Movement)' और 'तहरीके तर्के मुवालात [(Non Cooperation Movement)' (जिस का सही नाम तहरीके अ़दमे त'आवुन है)] चलाई गई, ताकि मुसलमान अपना सारा का सारा सरमाया, जोश में आकर तुर्की रवाना कर दें, और जितने मुसलमान अंग्रेजी कम्पनियों में सरकारी मुलाज़िम हैं, वो अपनी अपनी नौकरियाँ छोड़ दें और गरीब व लाचार होकर हिन्दुओं के ग़ुलाम बन जायें।

और आज भी मदरसा बोर्ड की मान्यता ख़त्म करने की पूरी पूरी कोशिश जारी है, ताकि मुसलमानों की सरकारी नौकरियाँ ख़त्म हो जायें। इन हिन्दुओं की तरफ़ से सिविल इम्तिहानात में भी उर्दू को ख़त्म करने की माँग की जा रही है, ताकि कोई भी मुसलमान ऑफिसर लाइन में ना जा पाये।

और अब कोरोना के नाम पर इनका 'इक़्तिसादी बॉयकॉट' उरूज पर होता जा रहा है, ताकि मुफ़्लिस मुसलमानों को इन मुशरिकीन का ग़ुलाम बना डालें।

मगर इन तीन मशहूर चालों के अलावा, एक चाल का ज़िक्र क़ुरआने करीम ने मज़ीद किया है, और वो है 'क़ैद', 

यानी मुसलमानों को मौक़ा पाते ही किसी ना किसी तरह क़ैदी बना दिया जाये, ताकि इसकी तमाम ह़िस व हरकत, उस तारीक कोठरी में अंधी होकर अपना दम तोड़ दे। आज भी सैकड़ों मुसलमान नौजवान जेल की सलाखों के पीछे अपना दम घोटने पर मजबूर हैं। चूँकि इन मुशरिकीन ने उन पर तरह तरह की तुहमतें व इल्ज़ामात लगाये और उन के खिलाफ़ मुक़द्दमात दर्ज किये।

खबरदार!
अब कोई ये बहाना नहीं बना सकता है, कि: "हमें तो कुफ्फ़ार की इन चालों के बारे में पता ही नहीं था", 
ये बहाना इसलिये बात़िल है, चूँकि कुफ्फ़ार की तमाम चालें क़ुरआन व हदीस में हज़ारों साल पहले ही मज़कूर हो चुकी थीं मगर हम ने उन्हें न जाना और न ही जानने की कोशिश की।

कुफ्फ़ारे मक्का ने आक़ा (ﷺ) के साथ जो बद सुलूकियाँ की थीं, वो भी इन्हीं चार चालों में से ही थीं, क़ुरआन मजीद उन के दज्ल व फरेब का ज़िक्र कुछ इस तरह से कर रहा है:

"وَإِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ أَوْ يَقْتُلُوكَ أَوْ يُخْرِجُوكَ....!"

"और ऐ महबूब! याद करो जब काफ़िर तुम्हारे साथ धोका करते थे, कि तुम्हें 'बन्द कर लें' या 'शहीद कर दें' या 'निकाल दें"...!
[तरजमा-ए-कंज़ुल ईमान, 8:30]

इस आयत में ग़ौर करें कि किस तरह अल्लाह तआ़ला ने हमें इन कुफ्फार की चालों से आगाह किया, यहाँ तीन चालों का ज़िक्र है:

(1) क़ैद;
(2) क़त्ल;
(3) जलावतनी;

अब रह गया 'इस्तिसादी बॉयकॉट', तो इस की तअ़लीम हमें 'शिअ़बे अबी तालिब' से मिल रही है. इमाम बैहक़ी ने 'दलाइलुन् नुबुव्वह' में और इब्ने कसीर ने 'अल बिदाया वन् निहाया' में 'शिअ़बे अबी तालिब' के वाक़िये को तफ्सीलन ज़िक्र किया। कुफ्फ़ारे मक्का ने 'बनी हाशिम' और 'बनी मुत्तलिब' के खिलाफ़ जो मक्कारियाँ इख़्तियार की, उन का एक किताबचा तैयार किया, और उसे कअ़ब-ए-मुअ़ज़्ज़्मा में लटका दिया। कुतुबे सियर व अह़ादीस के अल्फाज़ कुछ इस तरह हैं:

"....اجتمعوا علي أن يكتبوا فيما بينهم علي بني هاشم و بني المطلب أن لا يُنكِحوهم و لا يَنكَحوا إليهم، و لا يبايعوهم و لا يبتاعوا منهم؛ و كتبوا صحيفة في ذلك، و علقوها بالكعبة، ثم عدوا علي من أسلم، فأوثقوهم و آذوهم، واشتدّ البلاء عليهم، و عظمت الفتنة، و زلزلوا زلزالا شدیدا....!"

"....कुफ्फ़ारे मक्का इकट्ठे हुये, ताकि बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब के खिलाफ़ जो उन्होंने आपस में फैसला किया था उसे लिखें, कि वो उन (के ख़ानदान) से (शादी के लिये) न उन की बेटी लेंगे और न ही अपनी बेटी उन्हें देंगे, और न ही उन से कुछ खरीदेंगे, और न ही उन्हें कुछ बेचेंगे, और इस मुआमले में उन्होंने एक किताबचा लिखा और उस किताबचे को कअ़बा में लटका दिया। फ़िर मुसलमानों पर ज़ुल्म व ज़्यादती शुरू कर दी, और उन्हें क़ैद किया और उन्हें अज़ियतें दी और मुसलमानों पर मुसीबत सख़्त हो गई और फितना बहुत बढ़ गया और उन (मुसलमानों) पर (ज़ुल्म व सितम के) ज़लज़ले तोड़े गये...।"

[رواه البيهقي في الدلائل و ابن كثير في البداية]

इस इबारत में ग़ौर करने से ये बात आश्कार हो जाती है कि कुफ्फ़ार की एक बड़ी चाल मुसलमानों का इक़्तिसाद बुहरान भी है, क़ाबिले ज़िक्र अल्फाज़ ये हैं:

(1) शादी के लिये उन की लड़की न लेना;
(2) शादी के लिये उन्हें अपनी लड़की न देना;
(3) न उन से कुछ खरीदना;
(4) न उन्हें कुछ बेचना;

नम्बर तीन और चार 'इक़्तिसादी बॉयकॉट' की खबर दे रहे हैं; जबकि साथ ही नम्बर एक और दो 'समाजी बॉयकॉट' की भी ग़म्माज़ी कर रहे हैं...!

अब रही बात ये कि मुसलमानों का, कुफ्फ़ार की जानिब से होने वाले इस 'इक़्तिसादी बॉयकॉट' से कैसे बचा जाये, और मुसलमानों की मईशत को मज़बूत बनाने के लिये क्या किया जाये...?

तो इस का ह़ल भी आ़ला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान ह़नफ़ी क़ादिरी बरकाती बरेलवी (अ़लैहिर्रह़मह) की जानिब से सुनें। आप ने अपने रिसाले 'तदबीरे फलाहो नजातो इस्लाह़' में, मुसलमानों की मईशत को मज़बूत बनाने पर अ़मल पैरा होने की हिदायत की, जिन का ख़ुलासा ये है:

(1) वो चंद मुआ़मलात, जिन में हुकूमत की मुदाख़लत लाज़िम होती हैं, उन के अलावा अपने तमाम मुआ़मलात को मुसलमान अपने हाथों में लें, अपने सब मुआ़मलात का फ़ैसला अपने आप ही करें, ताकि ये करोड़ों रूपये जो स्टाम्प व वकालत में खर्च हो जाते हैं, मुकद्दमा की वजह से घर के घर तबाह हो जाते हैं, वो इन बरबादियों से महफूज़ रहें।

(2) मुसलमान अपनी क़ौम के सिवा किसी से कुछ न खरीदें, ताकि घर का नफ़ा घर ही में रहे। अपने खुद के कारोबार को तरक़्क़ी दें, ताकि किसी चीज़ में किसी दूसरी क़ौम के मुहताज ना रहें।

(3) बड़े शहरों के अमीर तबक़े के मुसलमान अपने ग़रीब मुसलमान भाइयों के लिये 'मुस्लिम बैंक' खोलें, ताकि हलाल तरीक़े से उन्हें क़र्ज़ फराहम हो और उन की ज़रूरतों की ठीक से अदायगी हो जाये, साथ ही नफ़ा के वो तरीक़े जो शरीअ़ते मुतह्हरा में बताये हैं उन्हें अपनाया जाये, ताकि सूद जैसी बला से अमीर व ग़रीब, सब मुसलमानों की जान छूटे। इस सूद की अदायगी की वजह से न जाने कितने ग़रीब मुसलमानों की ज़मीन जायदाद, अमीर कुफ्फ़ार की भेंट चढ़ गई।

(4) सब से अहम व अजल्ल व अशरफ व अफ्ज़ल जो है, वो है हमारा 'दीने इस्लाम', इस पर मज़बूती से क़ाइम रहना ही हमारे लिए कामयाबी व कामरानी का सबब है। इसी दीने मतीन पर साबित क़दम रहने के सबब, न जाने कितने ग़ुरबा व फुक़रा, तख़्ते शाही की रौनक बने, मगर याद रहे कि इस दीन का तअ़ल्लुक़ 'इल्मे दीन' सीखने - सिखाने से है, इ़ल्मे दीन सीखना और उस पर अमल करना ही, दोनों जहाँ में नजात का ज़रिया है।

मेरे प्यारों...!

ज़रा इन चार निकाती हिदायात पर गौर करें, और इन पर अ़मल करें, फिर देखें कि कैसे हमारे हालात में तब्दीलियाँ आनी शुरू होती हैं, इन् शा अल्लाह अ़ज़्ज़ व जल्ल! 

मज़ीद ये कि हमें ये देखना होगा, कि तक़रीबन 1400 साल पहले, या 100 साल पहले, या जब भी मुसलमानों के साथ ये सब किया गया, तो उन्होंने इस से किस तरह नजात पायी थी।

हमें अपने माज़ी को अपना उस्ताद बनाना होगा, ताकि हम अपने उरूज व ज़वाल, मिल्कियत व ग़ुलामी, फ़तह व मग़लूबियत के असबाब को अच्छी तरह जान लें और उन से खबरदार हो जायें।

अल्लाह तआ़ला हमारे हालात पर रह़म फरमाये,
आमीन सुम्मा आमीन बिजाहिन् नबिय्यि (सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम), 

मुह़म्मद क़ासिमुल क़ादिरी, 
मुतअ़ल्लिम: जामिया अहसनुल बरकात,
मारहरा शरीफ़ (यू.पी.)

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