एक रिवायत अनेक नसीहत


इमाम सुयूती रहीमहुल्लाह लिखते हैं : 

हज़रते अबुल अब्बास मुस्तगफ़िरी रहीमहुल्लाह बयान करते हैं कि मैं तलबे इल्म के लिये मिस्र गया, वहां पर हदीस के बहुत बड़े आलिम हज़रते अबू हामिद मिस्री से हदीस -ए- खालिद बिन वलीद रदिअल्लाहु त'आला अन्हु सुनाने की दरख्वास्त की तो उन्होने मुझे एक साल के रोज़े रखने का हुक्म फ़रमाया।


उन के इस हुक्म पर अमल के बाद दोबारा हाज़िरे ख़िदमत हुआ तो उन्होंने अपनी सनद से हदीस -ए- ख़ालिद बिन वलीद रदिअल्लाहु त'आला अन्हु सुनाई। 

चुनान्चे, हज़रते सैय्यिदुना ख़ालिद बिन वलीद रदिअल्लाहु त'आला अन्हु से रिवायत है कि एक आ'राबी ने बारगाहे रिसालत मआब में हाज़िरी दी और अर्ज़ की :

दुनिया व आख़िरत के बारे में कुछ पूछना चाहता हूं।

रसूल -ए- करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : पूछो ! जो पूछना चाहते हो।


आने वाले ने अर्ज़ की : मैं सब से बड़ा आलिम बनना चाहता हूं।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अल्लाह से डरो, सब से बड़े आलिम बन जाओगे।


अर्ज़ की : मैं सब से ज़्यादा गनी बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने  इरशाद फ़रमाया : क़नाअत इख्तियार करो, गनी हो जाओगे।


अर्ज़ की : मैं लोगों में सब से बेहतर बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : लोगों में सब से बेहतर वोह है जो दूसरों को नफ्अ पहुंचाता हो, तुम लोगों के लिये नफ्अ बख़्श बन जाओ।


अर्ज़ की : मैं चाहता हूँ कि सब से ज़्यादा अद्ल करने वाला बन जाऊँ।

करीम आक़ा ﷺ ने  इरशाद फ़रमाया : जो अपने लिये पसन्द करते हो वही दूसरों के लिये भी पसन्द करो, सब से ज़्यादा आदिल बन जाओगे।


अर्ज़ की : मैं बारगाहे इलाही में खास मक़ाम हासिल करना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : ज़िक्रुल्लाह की कसरत करो, अल्लाह त'आला के ख़ास बन्दे बन जाओगे।


अर्ज़ की : अच्छा और नेक बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अल्लाह त'आला की इबादत यूँ करो गोया तुम उसे देख रहे हो और अगर तुम उसे नहीं देख रहे तो वोह तो तुम्हें देख ही रहा है।


अर्ज़ की : मैं कामिल ईमान वाला बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अपने अख़्लाक़ अच्छे कर लो, कामिल ईमान वाले बन जाओगे।


अर्ज़ की : (अल्लाह त'आला का) फ़रमां बरदार बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अल्लाह त'आला के फ़राइज़ का एहतिमाम करो, उस के मुतीअ (व फ़रमां बरदार) बन जाओगे।


अर्ज़ की : (रोज़े कियामत) गुनाहों से पाक हो कर अल्लाह त'आला से मिलना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फरमाया : गुस्ले जनाबत खूब अच्छी तरह किया करो, अल्लाह त'आला से इस हाल में मिलोगे कि तुम पर कोई गुनाह न होगा।

 

अर्ज़ की : मैं चाहता हूँ कि रोज़े कियामत मेरा हश्र नूर में हो।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : किसी पर ज़ुल्म मत करो, तुम्हारा हश्र नूर में होगा।


अर्ज़ की : मैं चाहता हूँ कि अल्लाह त'आला मुझ पर रहम फ़रमाये।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अपनी जान पर और मख्लूक़े ख़ुदा पर रहम करो, अल्लाह तआला तुम पर रहूम फ़रमायेगा।


अर्ज़ की : गुनाहों में कमी चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : इस्तिग़फ़ार करो, गुनाहों में कमी होगी।


अर्ज़ की : ज़्यादा इज़्ज़त वाला बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : लोगों के सामने अल्लाह त'आला के बारे में शिकवा व शिकायत मत करो, सब से ज़्यादा इज़्ज़तदार बन जाओगे।


अर्ज़ की : रिज़्क में कुशादगी चाहता हूं।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : हमेशा बा वुज़ू रहो, तुम्हारे रिज़्क में फ़राखी आएगी।


अर्ज़ की : अल्लाह व रसूल का महबूब बनना चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अल्लाह व रसूल की महबूब चीज़ों को महबूब और ना पसन्द चीज़ों को ना पसन्द रखो।


अर्ज़ की : अल्लाह तआला की नाराज़ी से अमान का तलबगार हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : किसी पर गुस्सा मत करो, अल्लाह त'आला की नाराज़ी से अमान पा जाओगे।


अर्ज़ की : दुआओं की क़ुबूलिय्यत चाहता हूँ।

करीम आक़ा ﷺ ने  इरशाद फ़रमाया : हराम से बचो, तुम्हारी दुआयें क़ुबूल होंगी।


अर्ज़ की : चाहता हूँ कि अल्लाह मुझे लोगों के सामने रुस्वा न फ़रमाये।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फरमाया : अपनी शर्मगाह की हिफाज़त करो, लोगों के सामने रुस्वा नहीं होगे।


अर्ज़ की : चाहता हूँ कि अल्लाह त'आला मेरी पर्दापोशी फ़रमाए।

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फरमाया : अपने मुसलमान भाइयों के ऐब छुपाओ, अल्लाह तुम्हारी पर्दापोशी फरमायेगा।


अर्ज़ की : कौन सी चीज़ मेरे गुनाहों को मिटा सकती है?

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : आँसू, आजिज़ी और बीमारी।


अर्ज़ की : कौन सी नेकी अल्लाह के नज़दीक सब से अफ़्ज़ल है?

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : अच्छे अख्लाक, तवाज़ोअ, मसाइब पर सब्र और तक़्दीर पर राज़ी रहना।


अर्ज़ की : सब से बड़ी बुराई क्या है? कौन सी बुराई अल्लाह के नज़दीक सब से बड़ी है?

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : बुरे अख़्लाक़ और बुख्ल।


अर्ज़ की : अल्लाह त'आला के गज़ब को क्या चीज़ ठन्डा करती है?

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : चुपके चुपके सदक़ा करना और सिलए रेहमी।


अर्ज़ की : कौन सी चीज़ दोज़ख़ की आग को बुझाती है?

करीम आक़ा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया : रोज़ा।


(جامع الاحادیث، ج19، ص405، ح14922 بہ حوالہ اعرابی کے سوالات اور عربی آقا کے جوابات) 


इस हदीस के रावी हज़रते सय्यिदुना अबुल अब्बास मुस्तगफ़िरी रहीमहुल्लाह का शौके इल्म देखिए कि एक हदीस सुनने के लिये एक साल के रोज़े रखने पर तैय्यार हो गए। इस में उन के लिये दर्स है जो फ़ी ज़माना आसानी होने के बावजूद इल्मे दीन सीखने से जी चुराते हैं।


इस एक रिवायत में नसीहत के कई मोती मौजूद हैं जिन में से हर एक में दुनिया और आखिरत की भलाईयां समाई हुई हैं।


अब्दे मुस्तफ़ा

Post a Comment

Leave Your Precious Comment Here

Previous Post Next Post