ग़ीबत


हुज़ूर ज़िया उल मिल्लत, ख़लीफा-ए-आला हज़रत, अल्लामा ज़िया उद्दीन मुहाजिर मदनी अलैहि रेहमा की मजलिस में कोई ग़ीबत ना करसकता था। अगर कोई जुर्रत करता तो आप बुलंद आवाज़ से दुरूद शरीफ़ पढ़ने लगते और किसी ना किसी तरह उस को ग़ीबत से रोक देते। हमारी महफ़िलों में ग़ीबत का रिवाज है

अपनों की ग़ीबतें

ग़ैरों की ग़ीबतें

मोहसिनों की ग़ीबतें

बुज़ुर्गों की ग़ीबतें

गोया ग़ीबत ओढ़ना बिछौना हो गया

ख़ुद बिगड़ते हैं, दूसरों को बिगाड़ते हैं


हज़रत ज़ियाउल मिल्लत अलैहि रेहमा का दामन इस्मत ग़ीबत से बिलकुल पाक था

ना ग़ीबत सुनते ना ग़ीबत करते

वो मिलते भी थे मिलाते भी थे

हम अपनों से दूर होते चले जाते हैं और दूर करते चले जलाते हैं


(ख़ुलफ़ाए मुहद्दिस-ए-बरेलवी अज़ माहिर रज़विय्यत मसऊदे मिल्लत डाक्टर मसऊद अहमद नक़्शबंदी मुजद्ददी रेहमतुल्ला अलैहि)


एक हम हैं जिनकी कोई मजलिस बग़ैर ग़ीबत के नहीं होती

जब कभी चार लोग मिले ग़ीबत सुनने सुनाने का बाज़ार गर्म और महसूस तक नहीं करते कि हम कितनी आसानी से दोज़ख़ का सामान इकट्ठा कर रहे हैं। काश हमें फ़िक्र आख़िरत नसीब हो जाए। कुछ कहने सुनने से पहले ज़रा सोचें कि क्या सुन रहे हैं

ये केहना सुनना अल्लाह पाक की ना-फ़रमानी का बाइस तो नहीं? 


अबदे मुस्तफ़ा

तुराब उल-हक़ कादरी

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