कुछ करना होगा


बैठने से काम नहीं चलेगा!

कुछ तो करना होगा!

सोचना अच्छा है पर सिर्फ सोचना अच्छा नहीं!

कम से कम अपनी सोच, अपनी फ़िक्र, अपने ख्याल का इज़हार कीजिये ताकि दूसरों के लिये वो एक मक़्सद बन जाये।


आप क़ादिर हैं जिस पर वो तो करें, 

हर शख्स अपना बेहतर दिखाने की कोशिश करे।

सुकूत मौत है।

कोहराम मचाना होगा।

जिस शोबे में जायें तो अपनी पूरी ताक़त लगा दें।

हार उसी वक़्त मानें जब आखिरी साँस आ जाये।


तसल्सुल के साथ थोड़ा अ़मल भी खूब फाइदा देता है।

आज से शुरू करें जो आप कर सकते हैं, ना सोचें कि आप के बस का नहीं बल्कि उतर जायें मैदान में।

करना ही होगा वरना कौन आयेगा?

क्या हम सब एक दूसरे पर इल्ज़ाम देते रहेंगे या खुद अपनी ताक़त के मुताबिक़ और अपनी सलाहिय्यतों के मुताबिक़ मैदाने अ़मल में आयेंगे?


फैसला आप का है कि या तो मौक़ों के इंतिज़ार में इंतिज़ार बन जायें या खुद मौक़ा बन कर आगे बढें।


अ़ब्दे मुस्तफ़ा

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