जीते जी क़द्र बशर की नहीं होती प्यारे 


किसी ने कहा है :


जीते जी क़द्र बशर की नहीं होती प्यारे

याद आयेगी तुम्हें मेरी वफ़ा मेरे बाद।


इंसानी फ़ितरत है कि जब कोई चीज़ पास मौजूद हो तो उसकी अहमियत को अच्छी तरह समझ नहीं पाता। उसकी क़द्र जैसी करनी चाहिये वैसी नहीं करता और जब जुदा हो जाये तो फिर अफ़्सोस के हाथ मलता है।


उम्र भर संग ज़नी करते रहते अहले वतन

ये अलग बात है कि दफ़नायेंगे ऐज़ाज़ के साथ।


इंसान ने तो अल्लाह की ना शुक्री की फिर कोई बशर कैसे उम्मीद रखे कि मेरी इस दुनिया में जीते जी क़द्र की जायेगी।


अल्लाह त'आला फरमाता है :

وَ مَا  قَدَرُوا اللّٰہَ حَقَّ قَدۡرِہٖۤ


वो किसी ने कहा है ना कि :


दुनिया नहीं ऐशे जावेदानी के लिये

मजलिस ये नहीं मरसिया ख्वानी के लिये 


जब मा क़दरुल्लाहा खुदा कहता है

क्यों रोते हो अपनी क़द्र दानी के लिये


अब्दे मुस्तफ़ा ऑफिशियल

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