अपना काम बनता .... में जाये जनता


हज़रते सिर्री सक़्ती रहीमहुल्लाहु त'आला ने एक बार अल्हम्दु लिल्लाह कहा तो 30 साल तक अस्तगफार करते रहे!


किसी ने पूछा कि ऐसा क्यों? आप ने फरमाया कि एक मर्तबा एक शख्स मेरे पास आया और कहा कि बगदाद में आग लग गयी है जिस से मकानात वग़ैरह जल गये हैं लेकिन आप की दुकान बच गयी है तो मैने इस पर अल्हम्दु लिल्लाह कह दिया और इस पर नादिम हूँ कि मैने मुसलमानों के नुक़सान को नज़र अंदाज़ कर के अपने फाइदे को देख कर अल्हम्दु लिल्लाह कहा।

इसी वजह से मैं 30 साल से अस्तगफार कर रहा हूँ!


(رسالہ قشیریہ، اردو، ص74)


आज कल हम इतने खुदगर्ज़ हो चुके हैं कि अपने मुसलमान भाइयों को पहुँचने वाले नुक़सान से हमें कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता और ये तक कह देते हैं कि अपना काम बनता ...... में जाये जनता!


हमेशा अपना फाइदा देखना अच्छी बात नहीं है।

दूसरों को भी देख कर चलना चाहिये चाहे वो इल्म का मामला हो, माल का मामला हो या तिजारत हो।


अ़ब्दे मुस्तफ़ा

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