उर्दू शायरी का जनाज़ा


उर्दू बड़ी प्यारी ज़बान है और जब इस ज़बान में शायरी हो तो फिर क्या बात है।

अशआर तो कई ज़बानों में मिलेंगे पर उर्दू अशआर की बात ही जुदा है।


अफ़सोस की बात ये है कि कुछ लोगों ने इस प्यारी ज़बान की प्यारी शायरी का जनाज़ा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी!

अब ज़रा ये शेर देखें :


ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को

कर देंगे तड़ी पार बुलाऊँ क्या रज़ा को


फिर ये भी :


तुम लोग यज़ीदी हो बताते हो हुसैनी

चल जायेगी तलवार बुलाऊँ क्या अ़ली को


ये उर्दू शायरी का जनाज़ा ही है। ये शायरी कम और तफ़रीह का सामान ज़्यादा मालूम होता है। एक ये शेर देखें :


हश्मती उन को तेवर दिखा दीजिये

कान पे रख के घोड़ा दबा दीजिये


ऐसी शायरी करने वालों को शायरे हिन्दुस्तान तो पाकिस्तान और उस्ताज़ुश शुअ़रा और ना जाने क्या-क्या कह दिया जाता है।

शायरी ऐसी हो जिस में फ़िक्र व शऊर हो। ऐसे अलफाज़ होने चाहिये कि सुनने और पढ़ने वाला शायर के गहरे अहसासात में खो जाये।

आप आला हज़रत, बिरादरे आला हज़रत और ताजुश्शरिया रहीमहुमुल्लाहु त'आला और भी कई हस्तियाँ हैं कि उनके लिखे गये उर्दू अशआर को पढ़ें फिर आप खुद गौर करें कि आज उर्दू शायरी हो रही है या उस का जनाज़ा निकाला जा रहा है।


अ़ब्दे मुस्तफ़ा

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