ख्वाब में भी जिहाद की वसीय्यत


हज़रते अब्दुल्लाह बिन जाफ़रे तय्यार अपने वालिद के मज़ार की ज़ियारत के लिये हाज़िर हुये। आप के वालिद जंगे मोता में सना 8 हिजरी में रूमियों से जिहाद करते हुये शहीद हुये थे। अपने वालिद के मज़ार पर आप ने रात गुज़ारी और रात को ख्वाब में वालिदे मुहतरम की ज़ियारत हुई।


हज़रते अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैने देखा है कि वालिदे मुहतरम ने दो सब्ज़ रंग के हूल्ले पहन रखे हैं, आप के सर पर ताज है, आप के दो पर भी हैं और हाथ में एक तलवार है। आप ने मुझे तलवार देते हुये फ़रमाया :

ऐ बेटा! इस तलवार के साथ अपने दुश्मन को क़त्ल करो क्योंकि ये जो तुम मेरा मक़ाम देख रहे हो ये इसी जिहाद की बदौलत है।


(فتوح الشام، ذکر حدیث وقعۃ ابی القدس، ص94)


ये थे वालिदे मुहतरम जो वफ़ात के बाद भी ख्वाब में आकर जिहाद की तरगीब देते थे।

आज ना वालिद को और ना औलाद को जिहाद से कोई लेना देना है।

जिहाद हो ना हो ये अलग बात है लेकिन तैय्यारी कुछ भी नहीं है।

अगर आज इस क़द्र जिहाद के मौज़ू को एक तरफ ना किया जाता तो हालात शायद कुछ और होते।


अ़ब्दे मुस्तफ़ा

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