एक बीवी संभलती नहीं, तो चार कैसे?


ये जुमला बिल्कुल ऐसा है कि एक चक्के से गाड़ी चलती नहीं, तो चार से कैसे चलेगी?

चलिए, जब एक नहीं संभलती तो एक शादी भी क्यूँ करते हैं?

होना तो ये चाहिए कि आप भी उन औलिया की सीरत पर अ़मल करें, जिन्होंने औरतों के ह़ुक़ूक़ के ख़ौफ़ से निकाह़ न किया, जैसा कि हज़रत बिश्-र बिन ह़ारिस़ (रह़िमहुल्लाहु तआ़ला) फरमाते हैं कि मुझे किताबुल्लाह की एक आयत ने निकाह़ से रोक रखा है, कि 'औरतों के ह़ुक़ूक़ हैं', और शायद मैं इसे अदा न कर सकूं!


(देखें: "क़ूतुल् क़ुलूब़", जिल्द: 2, सफ़ा: 816)


अगर एक नहीं संभलती, जिसका मतलब है ह़ुक़ूक़ अदा नहीं हो पाते, तो फिर क्यूँ आप अपने लिए अ़ज़ाब का सामान तैयार कर रहे हैं? आपको तो चाहिए कि इन सूफ़िया की सीरत पर अ़मल करें. अब आप कहेंगे कि हम उन जैसे नहीं हैं, और जब चार शादियों की बात आती है तो भी यही कहा जाता है कि हम पहले वालों जैसे नहीं हैं। 

आपको तय कर लेना चाहिए कि आप हैं क्या? और अगर आप बिल्कुल अलग हैं तो क्या आपने अपना दीन भी अलग कर लिया है?


अस्ल में बात ह़ुक़ूक़ की नहीं, क्यूंकि कसरत से ऐसे लोग मौजूद हैं जो 4 बीवियों के ह़ुक़ूक़ आसानी से अदा कर सकते हैं, यहां बात है मुआ़शरे के बनाए हुए बेबुनियाद उसूलों की। 

आज अगर हिंदो पाक के अक्सर इलाक़ों में दूसरी शादी की जाए, तो लोग उसे अ़जीब नज़र से देखते हैं, और तरह तरह की बातें करते हैं, आख़िर ऐसा क्यूँ?

इसे ख़त्म करना होगा, ताकि एक मर्द फ़ितरत के मुत़ाबिक़ जाइज़ तरीक़े से फ़ायदा उठा सके, और निकाह़ को आ़म और आसान किया जा सके। 

अगर ये न हुआ, तो औरतों की तादाद वैसे भी ज़्यादा है और आगे मज़ीद ज़्यादा हो जाएगी, फिर ज़िना की कसरत होगी, और हम कुछ न कर सकेंगे। 


अ़ब्दे मुस्त़फ़ा

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