तकलीफ़ देने वाले 


किसी को तकलीफ़ देना बहुत बुरी बात है। 

आप ने जो तकलीफ़ किसी को पहुंचाई है वो ना जाने उसे कहां पहुंचा दे !


हम क्या कहें के तकलीफ़ देना कितना बड़ा जुर्म है...,

एक मसला शायाद अपने सुना होगा जो फिक़्ह की किताबों में आदाब ए मस्जिद के हवाले से मिलता है के :


و یمنع منه کل موذ ولو بلسانه (در مختار) 


यानी मस्जिद (में जाने) से हर इज़ा (तकलीफ़) देने वाले को रोका जाएगा अगर्चे वो ज़ुबान से इजा़ दे!


तकलीफ़ देने वाले कभी सुकून से नहीं रह सकते, उनका सुकून जाता नहीं बल्कि जल्दी छीन लिया जाता है। 


हम जान कर और बाज़ अवका़त अनजाने में किसी को तकलीफ़ पहुंचा देते है!

हमे अब ये इरादा कर लेना चाहिए के बिना किसी शरई वजह के किसी को तकलीफ़ नहीं पहुंचाएंगे चाहे वो लिख़ कर हो, बोल कर हो या किसी और तरीक़े से। 


अल्लाह पाक हमे किसी के दिल आजा़री का सबब बनने से बचाए। 


अब्दे मुस्तफा़

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