झूटे तबीब मुतवज्जेह हों


हदीसे पाक : "जो तकल्लुफ़न इलाज करे और उसे इल्मे तिब्ब ना हो तो वो ज़ामिन है।" 


नबी -ए- करीम के इस फ़रमान की वज़ाहत ये है कि जिस ने तिब्ब के उसूल व ज़वाबित ना पढ़े हों और वो लोगों के सामने खुद को तबीब ज़ाहिर करे और उस के इलाज से कोई मर जाये या मरीज़ को किसी क़िस्म का नुक़्सान पहुँचे तो वो जाली तबीब दिय्यत का ज़ामिन है। 


ख्वाह इन्सान हो या जानवर इलाज हर जानदार की ज़रूरत है चूँकि इन्सान मख्लूक़ात में अफ्ज़ल है इसीलिये उस की इज़्ज़त और तकरीम की अहमियत भी उतनी ही ज़्यादा बयान की गयी है और इंसानी जान की सिह्हत और उस की हिफ़ाज़त के लिये ज़रूरी इक़्दाम करने को ज़्यादा अहम क़रार दिया है। इन्सानी सिह्हत की हिफाजत के लिये इलाज की सहूलत होने के साथ मुआलिज का माहिर होना भी निहायत ज़रूरी है। 


माल व दौलत की लालच भी ऐसा करने पर उभारती है बिल खुसूस वो पस मांदा या तरक़्क़ी पज़ीर इलाक़े जहाँ अस्पताल की सहूलत मौजूद नहीं या बहुत दूर दूर है तो ऐसी सूरत में इस तरह के मक़ामात सोने की चिड़िया साबित होते हैं, ऐसे लोग उन मक़ामात पर अपनी नातजुर्बा कारी की वजह से कई जानों की ज़्या'अ का सबब बनते हैं। 

(ابن ماجہ، 4، حدیث، 3466) 


बाज़ अफ़राद को हर काम में कूदने और मुफ्त के मश्वरे देने का शौक़ होता है ऐसे लोग अपनी आदत से मजबूर होकर हर बीमारी का इलाज बताते फिरते हैं और उस तरीक़ा -ए- इलाज को अपनाने पर इसरार भी करते हैं कभी-कभी तो ऐसे टोटके भी बताते हैं जो मर्ज़ भगाने के बजाये उस की शिद्दत बढ़ा देता है और उन के मश्वरे के गलत होने का अंदाज़ा वक़्त गुज़रने के बाद होता है। ऐसे मश्वरे तदबीर के तजवीज़ कर्दा इलाज से वही नजात पा सकता है जिसकी अक़्ल हाज़िर और जिंदा हो।

(اسعاف الحاجتہ، 579، تحت الحدیث، 3466) 


बाज़ लोग मरीज़ से बुग्ज़ व कीना की वजह से उसे गलत दवाईयाँ बता देते हैं और दवाइ के उल्टे असारात देख कर खुश होते हैं। 


बाज़ लोगों को इन्सानो पर तजुर्बे करने का शौक़ होता है उसी शौक़ को वो यू पूरा करते हैं कि तरह-तरह दवाइयों के फवाइद व नुक़्सान जानने के लिये आम सीधे सादे और भोले भाले लोगों पर तजुर्बा करते हैं उमूमन मेडिकल स्टोर वालों से लोग बीमारी बता कर दवा तलब करते हैं वो भी तजुर्बे के शौक़ मैं डॉक्टर की हिदायत के बगैर दवा दे देते हैं जिस के नताइज तक़्लीफ में इज़ाफे और जान जाने जैसी भयानक सूरत में निकलते हैं। 


झूटे तबीब दर-असल बे रहमी इन्तिक़ामी मिजाज़ और इस तरह के कई वुज़ुहात के पैदावर होते हैं लिहाज़ा हमें ये याद रखना चाहिये कि इस्लाम हमें रहम दिली का हुक़्म देता है।


चुनाँचे हदीसे क़ुदसी मैं है : अगर तुम मेरी रहमत चाहते हो तो मेरी मख्लूक़ पर रहम करो। 


नबी -ए- करीम सल्लल्लाहो अलैही वसल्लम ने फ़रमाया : बेशक़ अल्लाह पाक अपने रहम करने वाले बंदो पर ही रहम फ़रमाता है। इस्लाम हमें बेहसी व बेरहमी से बचाता है जैसा कि हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैही वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया जो लोगों पर रहम नहीं करता अल्लाह पाक उस पर रहम नहीं फ़रमाता। 

(مسلم، ص975، حدیث2318) 


मरीज़ो पर रहम का तक़ाज़ा ये है कि हम किसी भी तरह गलत इलाज बताने के बजाये माहिर डॉक्टर से रुजू करने का मश्वरा दें इस सिलसिले में मरीज़ पर आने वाली माली दुश्वारियों को भी हस्बे तौफ़ीक़ दूर करने की कोशिश करे और ये सब करते हुये ऐसे अल्फाज़ इस्तिमाल करने से बचे जो मरीज़ को घायल कर दें बल्कि वो लहजा इख्तियार करें जो उसे इलाज का काइल और डॉक्टर की जानिब माइल कर सके हमारा ये रवैया झूटे तबीबों में कमी का सबब बनेगा। इंशा अल्लाह 

(ماخوذ، ماہنامہ فیضنِ مدینہ، دعوتِ اسلامی)


अब्दे मुस्तफ़ा 
दिलबर राही अस्दक़ी

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